150+ सन्त कबीर के दोहे अर्थ सहित हिंदी में - Fb Jahar Status

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Saturday, May 9, 2020

150+ सन्त कबीर के दोहे अर्थ सहित हिंदी में

Kabir ke Dohe with Meaning in Hindi| Kabir Das ke Dohe in Hindi | Kabir ke Dohe in Hindi : Sant Kabir Das was a 15th century indian poet. Whose couplets (Dohe) are very famous. So today we have brought this post of their famous couplets for you. 

In which you will get the best "kabir ke dohe with meaning in hindi".
So, get ready guys, here are some of the best "Kabir Das Ke dohe in Hindi" and "kabir ke dohe" with their respective meanings in hindi.

image of Kabir ke dohe


Sant Kabir Das ji ke dohe | सन्त कबीर के दोहे अर्थ सहित हिंदी में 



************ #1 ************

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पांए।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताए।।
अर्थात 

इस दोहे में कबीर दास जी गुरु की महत्ता बताते हुए कहते हैं-

"गुरु और ईश्वर दोनों ही मेरे सम्मुख खड़े हैं, सबसे पहले किसके पैर स्पर्श करूँ ।
मैं पहले गुरु के पैर स्पर्श करूँगा क्योंकि गुरु ने ही मुझे ईश्वर को जानने का मार्ग दिखाया है" ।।


************ #2 ************

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।
पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब ।। 

अर्थात      

इस दोहे में कबीर दास जी समय की महत्ता बताते हुए कहते हैं-
"जो कल करना है, उसे आज करो और जो आज करना है, उसे अभी करो ।
कुछ ही समय में जीवन ख़त्म हो जायेगा, फिर तुम कब करोगे"।।


************ #3 ************


ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोए ।
औरन को सीतल करे, आपहुँ सीतल होए ।।

अर्थात

इस दोहे में कबीर दास जी बताते हैं-

"हमें ऐसी मधुर वाणी बोलनी चाहिए, जिससे दूसरों को शीतलता का अनुभव हो,
और साथ ही हमारा मन भी आनन्दित हो उठे" ।।


************ #4 ************


जो घर साधु न पूजिये, धरती की सेवा नाही ।
ते घर मरघट सा दिखे, भूत बसे दिन माही ।।

अर्थात

इस दोहे में कबीर दास जी साधु की महत्ता बताते हुए कहते हैं-

"जिस घर में साधु व सत्य की पूजा नहीं होती, उस घर में पाप बसता है । 
ऐसा घर तो एक मरघट के समान है, जहाँ दिन में ही भूत-प्रेत बसते हैं" ।।


************ #5 ************


जहां दया तहां धर्म है, जहां लोभ वहां पाप ।
जहां क्रोध तहां काल है, जहां क्षमा वहां आप ।।

अर्थात

इस दोहे में गुरु कबीर दास जी कहते हैं-

"जिस स्थान पर दया का वास होता है, वहीं पर ही धर्म का स्थान होता है, और जहाँ लालच होता है, वहां पाप भी होता है।
जहां क्रोध का वास होता है, वहाँ 'काल' अर्थात अंत होता है और जहां क्षमा का स्थान होता है, वहाँ 'आपका' अर्थात ईश्वर का निवास होता है" ।।


************ #6 ************


जल में बसे कुमुदिनी, चंदा बसे आकाश ।
जो है जा को भावते, सो ता ही के पास ।।

अर्थात

"जल में कमल खिलता है और आकाश में 'चंदा' अर्थात 'चाँद'।
जब चन्द्रमा का प्रतिबिंब जल में दिखता है, तो ऐसा लगता है कि दोनों पास पास हैं। जैसे चन्द्रमा स्वयं कमल के पास आ गए हों।

ठीक इसी प्रकार जो व्यक्ति ईश्वर भक्ति और ईश्वर प्रेम करता है, तो स्वयं ईश्वर चलकर उसके पास आते हैं" ।।


************ #7 ************


मन के मते ना चालिए, मन के मते अनेक ।
जो मन पर अवसर नहीं, है साधु कोई एक ।।

अर्थात

इस दोहे में कबीर दास जी मन की चंचलता के विषय में बताते हुए कहते हैं-

"मन के कहने पर मत चलें, क्योंकि मन हमारा चंचल होता है और इसमें अनेकों विचार उतपन्न होते हैं ।
जो मन सर्वदा एक स्थिर रहता है, वह दुर्लभ मन कोई एक ही होता है" ।।


************ #8 ************


मनवा तो पंछी भया, उड़के चला आकाश।
ऊपर ते ही गिर पड़ा, या माया के पास।।

अर्थात

"यह मन तो पक्षी होकर भावना रुपी आकाश में उड़ चला ।
ऊपर पहुँच जाने पर भी यह मन, पुनः नीचे आकर माया के निकट गिर पड़ा अर्थात मोह माया में फंसा व्यक्ति को कभी भी ईश्वर प्राप्ति नहीं होती" ।।


************ #9 ************


माया मुई न मन मुआ, मर मर गया शरीर ।
आशा तृष्णा न मरी, यों कह गया कबीर ।।

अर्थात

इस दोहे से तातपर्य है-

"संसार में रहते हुए ना तो माया मरती है ना ही मन।
शरीर तो न जाने कितनी बार मृत हो चुका है, परन्तु मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती, कबीरदास जी ऐसा अनेकों बार कह चुके हैं"।।


Kabir ke Dohe in Hindi

************ #10 ************


करता था तो क्यूं रहा, अब करि क्यों पछताय।
बोये पेड़ बबूल का तो, आम कहाँ से खाये।।

अर्थात

कबीरदास जी कर्मो के बारे मे बताते हुए कहते हैं-

"जब तुम बुरे कार्य करते थे, संतों के समझाने पर भी नहीं समझते थे, तो अब क्यों पछता रहे हो। 
जब तूमने काँटों वाले बबूल का पेड़ बोया है, तो बबूल ही उत्पन्न होंगें, आम नहीं, तो आप कहां से खाओगे। 
अर्थात जो प्राणी जैसा करता है, वैसा ही भरता है।।


************ #11 ************


कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहाँ उडी जाई। 
जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाई ।।

अर्थात

"इस संसार के व्यक्ति का शरीर पक्षी बन गया है और जहाँ उसका मन होता है, शरीर उड़कर वहीं पहुँच जाता है। 
सच है कि जो जैसी संगत में बैठता है, वह वैसा ही फल पाता है।।


************ #12 ************


बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर ॥

अर्थात

इस दोहे में कबीर दास जी इंसान के बड़प्पन पर टिप्पणी करते हुए समझाते हैं-

खजूर के वृक्ष की भाँति बड़े होने का कोई लाभ नहीं है, क्योंकि खजूर के वृक्ष से न तो राह से गुजर रहे लोगों को छाया मिलती हैं, न ही इसके फल सरलता से तोड़े जा सकते हैं। 
अर्थात् अपने बड़प्पन का प्रदर्शन करने से किसी का लाभ नहीं होता ।।


************ #13 ************


रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय ॥

अर्थात

इस दोहे में कबीर दास जी समय की महत्ता बताते हुए लिखते हैं-

"जो मनुष्य इस संसार में दिन के समय में बिना कोई कर्म किए रात्रि को सोता है और दिन भर खा कर ही समय व्यतीत कर देता है, वह अपने हीरे तुल्य व अमूल्य जीवन को कौड़ियों के भाव व्यर्थ ही गवा देता है" ।।


************ #14 ************


ते दिन गए अखारती, संगत भई न सन्त।
प्रेम बिना पशु जीव न, स्तय बिना भगवंत।।

अर्थात

"जीवन के वे दिन व्यर्थ ही व्यतीत हुए, जिन दिनों में संतों की संगति प्राप्त नहीं हुई। 
प्रेम बिना जीवन पशु के समान है और भक्ति के बिना इंसान को ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती है"।।


************ #15 ************


साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाए।
मैं भी भूखा ना रहूँ, ना साधु भूखा जाए॥ 

अर्थात

"हे परमात्मा आप मुझे इतना देना, जिसमे मेरी गुजर बसर हो जाए।
मैं खुद भी भोजन कर सकूँ और अपने अतिथि को भी भोजन करा सकूँ"।।


************ #16 ************


तन को जोगी सब करें, मन को विरला कोए।सहजे सब विधि पाइए, जो मन जोगी होए।।

अर्थात

"शरीर में भगवे वस्त्र धारण करना अति ही सरल है, परन्तु मन को योगी बनाना बिरले ही व्यक्तियों का काम है। 
उस व्यक्ति को सारी समस्याओ का समाधान मिल जाता है, जिसका मन योगी हो जाता है"।।


************ #17 ************


पाछे दिन पाछे गए, हरि से कियो न हेत।अब पछताय होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत।।

अर्थात

"पिछले दिन अब चले गये हैं, गुजरा हुआ कल कभी वापस नहीं आता। उस समय तो तो हरि का नाम नहीं लिया,
अब पछताने से क्या लाभ, जब सबकुछ चला गया है।।
अर्थात सुख के समय में ईश्वर का स्मरण नहीं किया, तो अब पछताने का कोई लाभ नहीं"।।


************ #18 ************


सब धरती कागज करूँ, लेखनी सब बनराए।सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा ना जाए।।

अर्थात

"यदि मैं इस सम्पूर्ण पृथ्वी के समान बड़ा कागज बनाऊं और संसार के सभी वृक्षों की कलम बना लूँ,
व सातों समुद्रों के बराबर स्याही बना लूँ, तब भी गुरु के गुणों को लिखना असम्भव है क्योंकि उनकी महिमा अपरंपार है"।।


************ #19 ************


निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाए।बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाए।।

अर्थात

"जो हमारी निंदा करता है, उसे हमेशा अपने पास ही रखना चाहिए क्योंकि वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमिया बता कर, हमारे स्वभाव को साफ़ करके परिवर्तन लाने में सहायक होता है"।।


Kabir Das ke Dohe with Meaning in Hindi


************ #20 ************


बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोए।जो मन देखा आपना, मुझ से बुरा न कोए।।

अर्थात

"जब मैंने इस संसार में बुराई को ढूंढा, तब मुझे कोई बुरा व्यक्ति नहीं मिला।
जब मैंने स्वयं का विचार किया, तो मुझसे ज्यादस बुराई कहीं और नहीं मिली। अर्थात दुसरों में अच्छा-बुरा देखने वाला व्यक्ति कभी स्वयं को नहीं जान पाता"।।


************ #21 ************


दुःख में सुमिरन सब करे ,सुख में करे न कोए।जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होए।।

अर्थात

कबीर दास जी कहते हैं-

"दुःख के समय मबसभी ईश्वर को याद करते हैं, पर सुख में कोई याद नहीं करता। 
यदि सुख में भी ईश्वर को याद किया जाए, तो दुःख कभी हो ही नहीं सकता"।।


************ #22 ************


 साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,सार-सार को कहि रहे, थोथा देई उड़ाय।

अर्थात

"इस संसार में ऐसे सज्जनों की आवश्यकता है, जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है। 
जो सार्थक को बचा लेंगे और निरर्थक को खत्म कर देंगे"।।


************ #23 ************


जब मैं था हरि नहीं, अब हरि हरि है मैं नाहीं।जब अंधियारा मिट गया, दीपक देर कमाही।।

अर्थात

"जब तक मन में अहंकार था तब तक ईश्वर का साक्षात्कार नहीं हुआ, जब अहंकार समाप्त हुआ तब जाकर प्रभु मिले। ईश्वर की सत्ता का बोध तभी हुआ। प्रेम में द्वैत भाव नहीं हो सकता, प्रेम की पतली गली में केवल एक ही समा सकता है - अहम् या परम, परम की प्राप्ति के लिए अहंकार का विसर्जन आवश्यक है"।।


************ #24 ************


माला फेरत जुग भया, मिटा न मन का फेर।करका मन का डार दे, मन का मनका फेर।।

अर्थात

कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती। 
हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या फेरो।।


************ #25 ************


जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

अर्थात

"सज्जन की जाति नहीं पूछनी चाहिए, उसके ज्ञान को समझना चाहिए। तलवार का मूल्य होता है ना कि उसकी मयान का या उसे ढकने वाले खोल का"।।


************ #26 ************


तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय।कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

अर्थात

"एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा नहीं करनी चाहिए, जो हमारे पांवों के नीचे दब जाता है।
यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे, तो असहनीय पीड़ा होती है"।।


************ #27 ************


हाड जले लकड़ी जले, जले जलावन हार। कौतिकहारा भी जले, कासों करूं पुकार॥

अर्थात

"दाह -क्रिया में हड्डियां जलती हैं, उन्हें जलाने वाली 'लकड़ीयां' भी जल जाती हैं। 
उनमें आग लगाने वाला व्यक्ति भी, एक दिन जल जाता है, समय आने पर, उस दृश्य को देखने वाला दर्शक भी जल कर स्वाहा हो जाता है"।।


************ #28 ************


जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।।

अर्थात

जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते हैं, जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है।
और हम उसे किनारे बैठकर बस देखते रह जाते हैं।।


************ #29 ************


बिन रखवाले बाहिरा, चिड़िये खाया खेत।आधा परधा ऊबरै, चेती सके तो चेत॥

अर्थात

रखवाले के बिना बाहर से चिड़ियों ने खेत में अनाज खा लिया।कुछ खेत अभी शेष है, जिसको चिड़िया ने नही खाया।
यदि सावधान हो सकते हो तो हो जाओ, उसे बचा लो

अर्थात जीवन में  असावधानी के कारण  इंसान अति कुछ गँवा देता है, उसे पता भी नहीं चलता, तब तक नुक्सान हो चुका होता है, 
यदि हम सावधानी बरतें तो अति नुक्सान से बच सकते हैं"।।


Kabir ji ke Dohe

************ #30 ************


माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रोंदे मोए।एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौदूंगी तोए।।

 अर्थात

"मिट्टी, कुम्हार से कहती है, कि आज तू मुझे पैरों तले कुचल (रौंद) रहा है।
एक दिन ऐसा भी आएगा, जब मैं तुझे पैरों तले रोंदूँगी"।।


************ #31 ************


चाह मिटी, चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह।जिसको कुछ नहीं चाहिए, वह शहनशाह॥

अर्थात

"जब से कुछ पाने की चाह और चिंता मिट गयी है, तब से मन बेपरवाह सा हो गया है।
इस संसार में जिसे कुछ नहीं चाहिए, बस वही सबसे बड़ा शहंशाह (राजा) है"।।


************ #32 ************


यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान।।

अर्थात

इस दोहे में कबीर दास जी कहते हैं-

"यह जो शरीर है, वो विष से भरा हुआ है, और गुरुदेव अमृत की खान हैं व ज्ञान का भंडार है।
यदि अपना शीश देने के बदले में भी हमें कोई सच्चा गुरु मिल जाए, तो ये सौदा भी अति सस्ता होगा"।।


************ #33 ************


मांगन मरण समान है, मत मांगो कोई भीख।मांगन से मरना भला, ये सतगुरु की सीख।।

अर्थात

"कबीर दास जी कहते हैं- कि मांगना तो मृत्यु के समान है, कभी किसी से भी भीख मत मांगो।
मांगने से भला तो मरना है, ये ही ईश्वर की सीख है"।।


************ #34 ************


कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हँसे हम रोए।ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोए।।

अर्थात

"जब हम पैदा हुए थे, उस समय सम्पूर्ण संसार खुश था और हम रो रहे थे। 
जीवन में कुछ ऐसा काम करके जाओ, कि जब हम मरें तो संसार रोए और हम हँसे।।


************ #35 ************


दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार।तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।।

अर्थात

"मनुष्य का जन्म मिलना बहुत दुर्लभ है, यह शरीर बार बार नहीं मिलता।
जैसे एक वृक्ष से गिरा हुआ पत्ता, वापस वृक्ष पर नहीं लग सकता"।।


************ #36 ************


जाता है सो जाण दे, तेरी दसा न जाइ।खेवटिया की नांव ज्यूं, घने मिलेंगे आइ॥

अर्थात

"जो जाता है उसे जाने दो,  तुम अपनी स्थिति व दशा को मत जाने दो।
यदि तुम अपने स्वरूप में बने रहे, तो केवट की नाव की तरह अनेक व्यक्ति आकर तुमसे मिलेंगे"।।


************ #37 ************


तू तू करु तो निकट है, दूर दूर करु हो जाय।ज्यौं गुरु राखे त्यों रहे, जो देवे सो खाय।।”

आर्थत

"गुरु और स्वामी जैसे रखे उसी प्रकार रहे, जो देवें वही खाय। कबीर दास जी कहते हैं कि यही अच्छे सेवक के आचरण होने चाहिए"।।


************ #38 ************

कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आइ।बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाइ।।

अर्थात

इस दोहे में कबीर दास जी कहते हैं-

"समुद्र की लहर में मोती आकर बिखर गए। 
बगुला उनका भेद नहीं जानता, परन्तु हंस उन्हें चुन-चुन कर खा रहा है।


************ #40 ************


दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त।अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।

अर्थात

"यह मनुष्य का स्वभाव है कि जब वह दूसरों के दोष देख कर हंसता है।
तब उसे अपने दोष याद नहीं आते, जिनका ना तो आदि है न ही अंत"।।


************ #41 ************


न्हाए धोए क्या भया, जो मन मैला न जाय।मीन सदा जल में रहे, धोए बास न जाय।।

अर्थात

पवित्र नदियों में शारीरिक मैल धो लेने से कल्याण नहीं होता। इसके लिए भक्ति व साधना के माध्यम से मल का मैल दोनो को साफ करना पड़ता है।
जैसे मछली हमेशा जल में रहती है, लेकिन इतना धुलकर भी उसकी दुर्गंध समाप्त नहीं होती।


************ #42 ************


मन मक्का दिल द्वारिका, काया काशी जान।दश द्वारे का देहरा, तामें ज्योति पिछान।।

अर्थात

पवित्र मन ही मक्का और दिल द्वारिका है और काया को ही काशी जानो।
दस द्वारों का शरीर, मंदिर में ज्ञान प्रकाशमय स्व स्वरूप चेतन को ही सत्य देवता समझों।।


************ #43 ************


पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भयो न कोए।ढाई अक्षर प्रेम के, जो पढ़े सो पंडित होये।।

अर्थात

"हमे मन वचन और कर्म से भी किसी का अहित नहीं करना चाहिए तभी हम सच्चे अर्थों में ज्ञानी हैं।
उन्होंने एक और बात की ओर इशारा किया है कि हमें अच्छी बातों को सुनने के साथ उन पर अमल भी करना चाहिए"।।


************ #44 ************


हरिजन सेती रूसणा, संसारी सूँ हेत।ते नर कदे न नीपजैं, ज्यूं कालर का खेत॥

अर्थात

"हरिजन से तो रूठना और संसारी लोगों के साथ प्रेम करना, ऐसों के अन्तर में भक्ति-भावना कभी उपज नहीं सकती, 
जैसे खारवाले खेत में कोई भी बीज उगता नहीं"।।


************ #45 ************


मूरख संग न कीजिए, लोहा जलि न तिराइ।कदली-सीप-भूवंग मुख, एक बूंद तिहँ भाई।।

अर्थात

"मूर्ख का साथ कभी नहीं देना चाहिए, उससे कुछ भी फलित होने का नहीं । 
लोहे की नाव पर चढ़कर कौन पार जा सकता है? 
वर्षा की बूँद केले पर पड़ी, सीप में पड़ी और सांप के मुख में पड़ी परिणाम अलग-अलग हुए- कपूर बन गया, मोती बना और विष बना"।।


************ #46 ************


माषी गुड़ मैं गड़ि रही, पंख रही लपटाइ।ताली पीटै सिरि धुनैं, मीठैं बोई माइ।।

अर्थात

"मक्खी बेचारी गुड़ में धंस गई, फंस गई, पंख उसके चेंप से लिपट गये।
मिठाई के लालच में वह मर गई, हाथ मलती व सिर पीटती हुई"।।


************ #47 ************


ऊँचे कुल क्या जनमियां, जे करनी ऊँच न होइ।सोवरन कलस सुरै भर्‌या, साधू निंदा सोई।।

अर्थात

"ऊँचे कुल में जन्म लेने से क्या होता है, यदि करनी ऊँची न हुई। 
साधु जन सोने के उस कलश की निन्दा ही करते हैं, जिसमें कि मदिरा भरी हो"।।


************ #48 ************


कबिरा खाई कोट की, पानी पिवै न कोई।जाई मिलै जब गंग से, तब गंगोदक होई।।

अर्थात

कबीर जी कहते हैं -

"किले को घेरे हुए खाई का पानी कोई नहीं पीता, कौन पियेगा वह गंदला पानी ? पर जब वही पानी गंगा में जाकर मिल जाता है, तब वह गंगोदक बन जाता है, "परम पवित्र"।।


************ #49 ************


कबीर तन पंषो भया, जहाँ मन तहाँ उड़ि जाई।जो जैसी संगति करै, सो तैसे फल खाई।।

अर्थात

"यह तन मानो पक्षी हो गया है, मन इसे चाहे जहाँ उड़ा ले जाता है । 
जिसे जैसी भी संगति मिलती है, संग और कुसंग - वह वैसा ही फल भोगता है"।।


Kabir Das ji ke Dohe in Hindi

************ #50 ************


कबीर मन तो एक है, भावै तहाँ लगाव।भावै गुरु की भक्ति करू, भावै विषय कमाव।।

अर्थात

"मन तो एक ही है, जहाँ अच्छा लगे वहाँ लगाओ।
चाहे गुरु की भक्ति करो, चाहे विषय विकार कमाओ"।।


************ #51 ************


कबीर मनहिं गयन्द है, अंकुश दै दै राखु।विष की बेली परिहारो, अमृत का फल चाखू।।

अर्थात

"मन मस्ताना हाथी है, इसे ज्ञान अंकुश दे दे कर अपने वश में रखो।
और विषय, विष, लता को त्यागकर स्वरुप ज्ञानामृत का शान्ति फल चखो"।।


************ #52 ************


मन को मारूँ पटकि के, टूक टूक है जाय।विष कि क्यारी बोय के, लुनता क्यों पछिताय।।

अर्थात

"जी चाहता है कि मन को पटक कर ऐसा मारूँ, कि वह चकनाचूर हों जाये।
विष की क्यारी बोकर, अब उसे भोगने में क्यों पश्चाताप करता है।।


************ #53 ************


मन दाता मन लालची, मन राजा मन रंक।जो यह मनगुरु सों मिलै, तो गुरु मिलै निसंक।।

अर्थात

यह मन ही शुद्धि अशुद्धि भेद का दाता, लालची, उदार, कंजूस बनता है। 
यदि यह मन निष्कपट होकर गुरु से मिले, तो उसे निसंदेह गुरु पद मिल जाय।।


************ #54 ************


जीवन में मरना भला, जो मरि जानै कोय।मरना पहिले जो मरै, अजय अमर सो होय।।

अर्थात

"जीते जी ही मरना अच्छा है, यदि कोई मरना जाने, मरने के पहले ही जो मर लेता है, वह अजर अमर हो जाता है।
शरीर रहते  जिसके समस्त अहंकार समाप्त हो गए, 
वे वासना विजयी ही जीवनमुक्त होते हैं।।


************ #55 ************


मैं जानूँ मन मरि गया, मरि के हुआ भूत।मूये पीछे उठि लगा, ऐसा मेरा पूत।।

अर्थात

"भूलवश मैंने जाना था कि मेरा मन भर गया, परन्तु वह तो मरकर प्रेत हुआ।
मरने के पश्यात भी उठकर मेरे पीछे लग पड़ा, ऐसा यह मेरा मन बालक की तरह है"।।


************ #56 ************


भक्त मरे क्या रोइये, जो अपने घर जाय।रोइये साकट बपुरे, हाटों हाट बिकाय।।

अर्थात

"जिसने अपने कल्याणरुपी अविनाशी घर को प्राप्त कर लिया, ऐसे सन्त भक्त के शरीर छोड़ने पर क्यों रोते हैं? 
बेचारे अभक्त अज्ञानियों के मरने पर रोओ, जो मरकर चौरासी के बाज़ार मैं बिकने जा रहे हैं"।।


************ #57 ************


मैं मेरा घर जालिया, लिया पलीता हाथ।जो घर जारो आपना, चलो हमारे साथ।।

अर्थात

"संसार शरीर में जो मैं, मेरापन की अहंता, ममता हो रही है। ज्ञान की आग बत्ती हाथ में लेकर इस घर को जला डालो"।।



************ #58 ************


शब्द विचारी जो चले, गुरुमुख होय निहाल।काम क्रोध व्यापै नहीं, कबूँ न ग्रासै काल।।

अर्थात

"गुरुमुख शब्दों का विचार कर जो आचरण करता है, वह कृतार्थ हो जाता है। 
उसको काम-क्रोध नहीं सताते और वह कभी मन कल्पनाओं के मुख में नहीं पड़ता"।।


************ #59 ************


सहज सहज सब कोई कहै, सहज न चीन्हैं कोय।पाँचों राखै पारतों, सहज कहावै साय।।

अर्थात

"सहज सहक सब कहते हैं परन्तु सहज क्या है इसको नहीं जानते।
विषयों में फैली हुई पाँचो ज्ञान इंद्रियों को जो अपने स्वाधीन रखता है, यह इन्द्रियजित अवस्था ही सहज अवस्था है"।।


************ #60 ************


सबही भूमि बनारसी, सब निर गंगा होय।ज्ञानी आतम राम है, जो निर्मल घट होय।।

अर्थात

"उनके लिए काशी की भूमि या अन्ये भूमि व गंगा नदी या अन्ये नदियां सब बराबर हैं। 
जो ह्रदय को पवित्र बनाकर ज्ञानी स्वरुप राम में स्थित हो गया"।।


************ #61 ************


अति का भला न बोलना, अति की भली न चुप।अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।

अर्थात

"अति बरसना भी ठीक नहीं होता है, और अति धूप होना भी लाभकर नहीं। 
इसी प्रकार अति बोलना अच्छा नहीं, बिलकुल चुप रहना भी अच्छा नहीं।।


************ #62 ************


कबिरा यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहिं।सीस उतारे भुइं धरे तब पइसे घर माँहि।।

अर्थात

"यह प्रेम का घर है। पाण्डित्य के अहंकार को घर के बाहर छोड़ना पड़ेगा। इस या उस पाण्डित्य के चक्कर में रहते ही है। वेद वाला पाण्डित्य छोड़ते हैं तो लोक वाले पाण्डित्य को पकड़ लेते हैं। 
वाइजगीरी की ऐसी लत लगी हुई है कि उसके बगैर काम ही नहीं चलता।।


************ #63 ************


पाछे लागा जाइ था लोक वेद के साथ।पैड़े में सतगुरु मिला दीपक दीन्हा हाथ।।

अर्थात

"लोक और वेद के पीछे भागने से काम नहीं चलेगा। अपने हाथ में दिया बारना होगा। यहाँ कबीर न तो लोक की भत्र्सना कर रहे हैं वे न ही वेद की पीछे लागने की आलोचना कर रहे हैं।
पिछलग्गूपन की आलोचना कर रहे हैं। 

हमारी शिक्षा ने, हमारे पाण्डित्य ने, हमारे ज्ञान ने, हमारे अहंकार ने हमें पिछलग्गू बना दिया है। हमारी स्वतन्त्र और उन्मुक्त दृष्टि ही नहीं रह गयी है। कबीर की चिन्ता यही है। यह चिन्ता वैयक्तिक भी है और सामाजिक भी"।।


************ #64 ************


ऐसा कोई ना मिला जासो रहिए लागि।सब जग जरता देखिया अपनी-अपनी आगि।।

अर्थात

"सारा संसार अपनी-अपनी आग में जल रहा है। इसे कबीर देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं। 
पर जग नहीं देख पा रहा है। इन्हीं बंधनों से जग बँधा हुआ है"।।


************ #65 ************


सुखिया सब संसार है, खाये औ सोये।दुखिया दास कबीर है, जागै औ रोवे।।

अर्थात

"संसार इसलिए सुखी है कि उसे बोध ही नहीं है अपने बंधनों का, वह जहाँ जाता है वहीं छला जाता है। 
चारों तरफ छल बादल हैं, पानी की उम्मीद में जाते हैं तो आग बरसने लगती है"।।


************ #66 ************


ओनई आई बादरी, बरसन लगा अंगार।उट्ठि कबीरा धाह दे, दाझत हैं संसार।।

अर्थात

"बादलों से अंगार बरस रहा है। जिसमें संसार जलने लगा है। पर उसे जलने का आभास ही नहीं है। लेकिन कबीर को पता है। इसलिए कबीर बेचैन हैं। कैसे इस आग से लोगों को बचाया जाय। 
कैसे इस ताप से लोगों को बचाया जाय। कबीर आग को बुझाने की बात नहीं कर रहे हैं। आग से लोगों को बचाने की बात कर रहे हैं"। 


************ #67 ************


तोहि मोहि लगन लगाये रे फकीरवा।सोवत ही मैं अपने मदिर में सबदन मारि जगाये रे फकीरवा।।बूड़त ही भव के सागर में बहियां पकरि समझाय रे फकीरवा।।एके वचन वचन नहि दूजा तुम मोसे बन्द छुड़ाये रे फकीरवा।।कहे कबीर सुनो भाई साधो, प्रानन प्रान लगाये रे फकीरवा।।

अर्थात

"ऐ फकीर ! तुमने मेरे भीतर लगन लगा दिया। मैं अपने घर में सोई हुई थी। तुमने शब्दों की मार से मुझे जगा दिया है। मैं तो भवसागर में डूब रही थी, तुमने बाॅह पकड़ कर मुझे बचा लिया। एक ही वचन से एक ही शब्द से तुमने मेरे बन्धन छुड़ा दिये। फकीर तुमने मेरे प्राणों को प्राणवान बना दिया।

इस पूरे पद की मुख्य बात है- मैं अपने घर में सो रही थी, भवसागर में डूब रही थी, तुमने शब्दों से मारकर जगा दिया ? मुक्ति का उपाय शब्द है"।।


************ #68 ************


सत गुरु सांचा सूरिबा, सबद जु बाहा एक।लागत ही भुईं मिलि गया, परा करेजे छेंक।।

अर्थात

सतगुरू ने शब्द के बाण से मारा। 
लगते ही मैं धराशायी हो गया। और मेरा कलेजा बिंध गया।।


************ #69 ************


कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीरे नीमकश को।ये खलिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता।।

तीर कलेजे में आकर धँस गया है, फॅस गया है और टभक रहा है। बिल्कुल यही बात कबीर कह रहे हैं- ‘परा करेजे छेंक’। कलेजे को भेदते हुए तीर पार कर जाता तो रात दिन की टभकन नहीं होती। यह निरन्तर टभक रहा है। यह अब सोने नहीं देगा। गाफिल नहीं होने देगा।


Inspirational Kabir Das ke Dohe 

************ #70 ************

साधो भाई जीवत ही करो आसा।जीवत समझे जीवत बूझे जीवत मुक्ति निवासा।जीवत करम की फाँस न काटी मुए मुक्ति की आसा।

अर्थात

"कबीर इस बात को कई तरह से कहते हैं। कबीर जबरर्दस्त कम्यूनिकेटर हैं। इस जीवन सत्य को अनुभव संवेदन को पहुँचाना आसान नहीं है। 
इसकी कठिनाई से कबीर वाकिफ हैं। कबीरदास इस विलक्षण अनुभव संवेदन को लोगों तक पहुँचाते हैं"।।


************ #71 ************


विरहिन उठि उठि भुईं परै, दरसन कारन राम।मुए दरसन देहुगे, सो आवे कवने काम।।मुए पीछे मति मिलौ, कहै कबीरा राम।लोहा माटी मिलि गया, तब पारस कौने काम।।

अर्थात

"राम के दर्शन के लिए विरहिणी तड़प रही है। उसे जीते जी दर्शन चाहिए। मरने के बाद दर्शन का क्या काम। भोजपुरी इलाके में एक मुहाबिरा चलता है। मुअले प बैद अइलें, मुँह लेके घरे गइलैं। मरीज के जीते जी वैद्य आये तो कुछ कर सकता है। 

मरने के बाद वह आकर क्या करेगा। भले ही वह वैद्य स्वयं राम ही क्यों न हों। मरने के बाद मिलने का आश्वासन व्यर्थ है। लोहा जब तक लोहा है, तभी तक कोई पारस उसे सोना बना सकता है। मिट्टी में मिल जाने के बाद पारस किसी काम का नहीं है। जीते जी मिलें तभी राम का मतलब है। मरने के बाद राम भी किसी काम के नहीं रह जायेंगे"।।


************ #72 ************


मुंद गयी खोलते ही खोलते आखें, गालिब।यार लाये मेरी बालीं प उसे, पर किस वक्त।।

एकै कुँवा पंच पनिहारी। एकै लेजु भरै नो नारी॥
फटि गया कुँआ विनसि गई बारी। विलग गई पाँचों पनिहारी॥



बैरागी बिरकत भला, गिरही चित्त उदार ।दुहुं चूका रीता पड़ैं , वाकूं वार न पार ।।।

अर्थात

"बैरागी वही अच्छा, जिसमें सच्ची विरक्ति हो, और गृहस्थ वह अच्छा, जिसका हृदय उदार हो । यदि वैरागी के मन में विरक्ति नहीं, और गृहस्थ के मन में उदारता नहीं, तो दोनों का ऐसा पतन होगा कि जिसकी हद नहीं"।।


************ #73 ************


`कबीर' हरि के नाव सूं, प्रीति रहै इकतार।तो मुख तैं मोती झड़ैं, हीरे अन्त न फार।।

अर्थात

इस दोहे में कबीर दास जी कहते हैं-

यदि हरि नाम पर अविरल प्रीति बनी रहे, तो उसके मुख से मोती ही मोती झड़ेंगे, और इतने हीरे कि जिनकी गिनती नहीं।
हरि भक्त का व्यवहार - बर्ताव सबके प्रति मधुर ही होता है- मन मधुर, वचन मधुर और कर्म मधुर।


************ #74 ************


कोइ एक राखै सावधां, चेतनि पहरै जागि ।बस्तर बासन सूं खिसै, चोर न सकई लागि।।

अर्थात

"पहर पहर पर जागता हुआ जो सचेत रहता है, उसके वस्त्र और बर्तन कैसे कोई ले जा सकता है? 
चोर तो दूर ही रहेंगे, उसके पीछे नहीं लगेंगे"।।


************ #75 ************


`कबीर' मारूँ मन कूं, टूक-टूक ह्वै जाई।बिष की क्यारी बोइ करि, लुणत कहा पछिताई।।

अर्थात

"इस मन को मैं ऐसा मारूँगा कि वह टूक-टूक हो जाय। 
मन की ही करतूत है यह, जो जीवन की क्यारी में विष के बीज मैंने बो दिये , उन फलों को तब लेना ही होगा, चाहे कितना ही
पछताया जाय"।।


************ #76 ************


आसा का ईंधण करूँ, मनसा करूँ बिभूति।जोगी फेरि फिल करूँ, यौं बिनना वो सूति।।

अर्थात

"आशा को जला देता हूँ ईंधन की तरह, और उस राख को तन पर रमाकर जोगी बन जाता हूँ। 
फिर जहाँ-जहाँ फेरी लगाता फिरूँगा, जो सूत इक्ट्ठा कर लिया है उसे इसी तरह बुनूँगा । 
अर्थात आशाएँ सारी जलाकर खाक कर दूँगा और निस्पृह होकर जीवन का क्रम इसी ताने-बाने पर चलाऊँगा"।।


************ #77 ************


पाणी ही तै पातला, धुवां ही तै झीण।पवनां बेगि उतावला, सो दोसत `कबीर' कीन्ह।।

अर्थात

"इस दोहे में कबीर दास जी कहते हैं कि ऐसे के साथ दोस्ती कर ली है मैंने जो पानी से भी पतला है और धुएं से भी ज्यादा झीना है । पर वेग और चंचलता उसकी पवन से भी कहीं अधिक है।
अर्थात पूरी तरह काबू में किया हुआ मन ही ऐसा दोस्त है"।।


************ #78 ************


चाल बकुल की चलत है, बहुरि कहावै हंस।ते मुक्ता कैसे चुगे, पड़े काल के फंस।।

अर्थात

"जो बगुले के आचरण में चलकर, पुनः हंस कहलाते हैं। 
वे ज्ञान मोती कैसे चुगेंगे ? वे तो कल्पना काल में पड़े हैं"।।


************ #79 ************


बाना पहिरे सिंह का, चले भेड़ की चाल।
बोली बोले सियार की, कुत्ता खावे फाल।।

अर्थात

"सिंह का वेष पहनकर, जो भेड़ की चाल चलता तथा सियार की बोली बोलता है, उसे कुत्ता जरूर फाड़ खायेगा"।।




************ #80 ************


जो मानुष ग्रह धर्म युत, राखै शील विचार।गुरुमुख बानी साधु संग, मन वच सेवा सार।।

अर्थात

"जो ग्रहस्थ मनुष्य गृहस्थी, धर्म युक्त रहता, शील विचार रखता। 
गुरुमुख वाणियों का विवेक करता, साधु का संग करता और मन, वचन, कर्म से सेवा करता है, उसी को जीवन में लाभ मिलता है"।।


************ #81 ************


शब्द दुरिया न दुरे, कहूँ जो ढोल बजाय।जो जन होवे जौहोरी, लेहैं सीस चढ़ाय।।

अर्थात

"ढोल बजाकर कहता हूँ निर्णय वचन किसी के छिपाने (निन्दा उपहास करने) से नहीं छिपते। 
जो विवेकी पारखी होगा, वह निर्णय-वचनों को शिरोधार्य कर लेगा"।।


************ #82 ************


एक शब्द सुख खानि है, एक शब्द दुःखराखि है।एक शब्द बन्धन कटे, एक शब्द गल फंसि।।

अर्थात

"समता के शब्द सुख की खान है, और विषमता के शब्द दुखो की ढेरी है। 
निर्णय के शब्दो से विषय बन्धन कटते हैं, और मोह-माया के शब्द गले की फांसी हो जाते हैं"।।


************ #83 ************


सीखै सुनै विचार ले, ताहि शब्द सुख देय।
बिना समझै शब्द गहे, कहु न लाहा लेय।।

अर्थात

जो निर्णय शब्दो को सुनता, सीखता और विचारता है, उसको शब्द सुख देते हैं।
यदि बिना समझे कोई शब्द रट ले, तो कोई लाभ नहीं पाता।।


************ #84 ************


भक्ति बीज पलटै नहीं, जो जुग जाय अनन्त।ऊँच नीच घर अवतरे, होय सन्त का सन्त।।

अर्थात

"प्रभु की की हुई भक्ति के बीज निष्फल नहीं होते चाहे अनंतो युग बीत जाये।
भक्तिमान जीव सन्त का सन्त ही रहता है, चाहे वह ऊँच-नीच माने गये किसी भी वर्ण-जाती में जन्म ले"।।


************ #85 ************


भक्ति पदारथ तब मिले, तब गुरु होय सहाय।प्रेम प्रीति की भक्ति जो, पूरण भाग मिलाय।।

अर्थात

"भक्तिरूपी अमोलक वस्तु तब मिलती है, जब यथार्थ सतगुरु मिलें और उनका उपदेश प्राप्त हो।
जो प्रेम प्रीति से पूर्ण भक्ति है, वह पुरुषार्थरुपी पूर्ण भाग्योदय से मिलती है।।


************ #86 ************


अनराते सुख सोवना, राते नींद न आय।ज्यों जल छूटी माछरी, तलफत रैन बिछाय।।

अर्थात

जिन्हें स्वरूपस्तिथि (कल्याण) में प्रेम नहीं है, वे विषय, मोह में सुख से सोते हैं परन्तु कल्याण प्रेमी को विषय मोह में नींद नहीं लगती।
उनको तो कल्याण की प्राप्ति के लिए वैसी ही छटपटाहट रहती है, जैसे जल से बिछुड़ी मछली तडपते हुए रात बिताती है।।


************ #87 ************


भक्ति जो सीढ़ी मुक्ति की, चढ़ै भक्त हरषाय।और न कोई चढ़ि सकै, निज मन समझो आय।।

अर्थात

"भक्ति मुक्ति की सीडी है, इसलिए भक्तजन खुशी खुशी उसपर चदते हैं। 
आकर अपने मन में समझो, दूसरा कोई इस भक्ति सीडी पर नहीं चढ़ सकता। सत्य की खोज ही भक्ति है"।।


************ #88 ************


भक्ति बिन नहिं निस्तरे, लाख करे जो कोय।शब्द सनेही होय रहे, घर को पहुँचे सोय।।

अर्थात

"कोई भक्ति को बिना मुक्ति नहीं पा सकता चाहे लाखो लाखो यत्न कर ले। 
जो गुरु के निर्णय वचनों का प्रेमी होता है, वही सत्संग द्वरा अपनी स्थिति को प्राप्त करता है"।।


************ #89 ************


सेवक स्वामी एक मत, मत में मत मिली जाय।चतुराई रीझै नहीं, रीझै मन के भाय।।

अर्थात

सवेक और स्वामी की पारस्परिक मत मिलकर एक सिद्धांत होना चहिये।
चालाकी करने से सच्चे स्वामी नहीं प्रसन्न होते, बल्कि उनके प्रसन्न होने का कारण हार्दिक भक्ति भाव होता है।।


सन्त कबीर दास जी के दोहे

************ #90 ************


सतगुरु शब्द उलंघ के, जो सेवक कहुँ जाय।जहाँ जाय तहँ काल है, कहैं कबीर समझाय।।

अर्थात

"सन्त कबीर जी समझाते हुए कहते हैं कि अपने सतगुरु के न्यायपूर्ण वचनों का उल्लंघन कर जो सेवक अन्ये ओर जाता है, वह जहाँ जाता है वहाँ उसके लिए काल है"।।


************ #91 ************


आशा करे बैकुंठ की, दुरमति तीनों काल।शुक्र कही बलि ना करीं, ताते गयो पताल।।

अर्थात

"आशा तो स्वर्ग की करता है, लकिन तीनों काल में दुर्बुद्धि से रहित नहीं होता। 
बलि ने गुरु शुक्राचार्य जी की आज्ञा अनुसार नहीं किया, तो राज्य से वंचित होकर पाताल भेजा गया"।।


************ #92 ************


कबीर संगत साधु की, नित प्रति कीजै जाय।दुरमति दूर बहावासी, देशी सुमति बताय।।

अर्थात

"प्रतिदिन जाकर संतों की संगत करो। 
इससे तुम्हारी दुबुद्धि दूर हो जायेगी और सन्त सुबुद्धि बतला देंगे"।।


************ #93 ************


कबीर संगत साधु की, जौ की भूसी खाय।खीर खांड़ भोजन मिलै, साकत संग न जाय।।

अर्थात

"इस दोहे में सन्त कबीर जी कहते हैं, सतों की संगत मैं, जौं की भूसी खाना अच्छा है।
खीर और मिष्ठान आदि का भोजन मिले, तो भी साकत के संग मैं नहीं जाना चहिये"।।


************ #94 ************


कबीर संगति साधु की, निष्फल कभी न होय।ऐसी चंदन वासना, नीम न कहसी कोय।।

अर्थात

"संतों की संगत कभी निष्फल नहीं होती। 
मलयगिर की सुगंधी उड़कर लगने से नीम भी चन्दन हो जाता है, फिर उसे कभी कोई नीम नहीं कहता"।।


************ #95 ************


संसारी से प्रीतड़ी, सरे न एको काम।दुविधा में दोनों गये, माया मिली न राम।।

अर्थात

"संसारियों से प्रेम जोड़ने से, कल्याण का एक काम भी नहीं होता। 
दुविधा में तुम्हारे दोनों चले जयेंगे, न माया हाथ लगेगी न स्वस्वरूप स्तिथि होगी, अतः जगत से निराश होकर अखंड वैराग्ये करो"।।


************ #96 ************


एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।कबीर संगत साधु की, कटै कोटि अपराध।।

अर्थात

"एक पल आधा पल या आधे का भी आधा पल, ही संतों की संगत करने से मन के करोडों दोष मिट जाते हैं"।।


************ #97 ************


ऊँचा महल चुनाइया, सुबरन कली दुलाय।वे मंदिर खाली पड़े रहै मसाना जाय।।

अर्थात

"स्वर्णमय बेलबूटे ढल्वाकर, ऊँचा मंदिर चुनवाया। 
वे मंदिर भी एक दिन खाली पड़ गये, और मंदिर बनवाने वाले श्मशान में जा बसे"।।


************ #98 ************


कहा चुनावे भेड़िया, चूना माटी लाय।मीच सुनेगी पापिनी, दौरी के लेगी आप।।

अर्थात

"चूना मिट्ठी मँगवाकर कहाँ मंदिर चुनवा रहा है ? पापिनी मृत्यु सुनेगी, तो आकर धर दबोचेगी।।


************ #99 ************


कोयला भी हो ऊजला, जरि बरि हो जो सेत।मूरख होय न अजला, ज्यों कालम का खेत।।

अर्थात

"कोयला भी उजला हो जाता है जब अच्छी तरह से जलकर उसमे सफेदी आ जाती है।
परन्तु मुर्ख का सुधरना उसी प्रकार नहीं होता जैसे ऊसर खेत में बीज नहीं उगते"।।


************ #100 ************


ऊँचे कुल की जनमिया, करनी ऊँच न होय।कनक कलश मद सों भरा, साधु निन्दा कोय।।

अर्थात

"जैसे किसी का आचरण ऊँचे कुल में जन्म लेने से, ऊँचा नहीं हो जाता।
इसी तरह सोने का घड़ा यदि मदिरा से भरा है, तो वह महापुरषों द्वारा निन्दित ही है"।।


************ #101 ************


जीवन जोवत राज मद, अविचल रहै न कोय।जु दिन जाय सत्संग में, जीवन का फल सोय।।

अर्थात

"जीवन, जवानी तथा राज्य का भेद से कोई भी स्थिर नहीं रहते। जिस दिन सत्संग में जाइये, उसी दिन जीवन का फल मिलता है"।।


************ #102 ************


काल काल तत्काल है, बुरा न करिये कोय।अन्बोवे लुनता नहीं, बोवे तुनता होय।।

अर्थात

"काल का विकराल गाल तुमको तत्काल ही निगलना चाहता है, इसीलिए किसी प्रकार भी बुराई न करो।
जो नहीं बोया गया है, वह काटने को नहीं मिलता, बोया ही कटा जाता है"।।


************ #103 ************


कबीर गर्ब न कीजिये, इस जीवन की आस।टेसू फूला दिवस दस, खंखर भया पलास।।

अर्थात

"इस जवानी कि आशा में पड़कर मद न करो।
दस दिनों में फूलो से पलाश लद जाता है, फिर फूल झड़ जाने पर वह उखड़ जाता है, वैसे ही जवानी को समझो"।।


************ #104 ************


कबीर गर्ब न कीजिये, इस जीवन कि आस।इस दिन तेरा छत्र सिर, देगा काल उखाड़।।

आर्थत

"गुरु कबीर जी कहते हैं कि मद न करो चर्ममय हड्डी कि देह का इक दिन तुम्हारे सिर के छत्र को काल उखाड़ देगा"।।


************ #105 ************


कबीर थोड़ा जीवना, माढे अति मढ़ान।सबही ऊभा पन्थसिर, राव रंक सुल्तान।।

अर्थात

"जीना तो थोड़ा है, और ठाट-बाट अति रचता है।
राजा-रंक महाराजा आने-जाने का मार्ग सबके सिर पर है, सब बारम्बार जन्म मरण में नाच रहे हैं"।।


************ #106 ************


कबीर यह संसार है, जैसा सेमल फूल।दिन दस के व्येवहार में, झूठे रंग न भूले।।

अर्थात

"गुरु कबीर जी कहते हैं कि इस संसार की सभी माया सेमल के फूल के भांति केवल दिखावा है।
अतः झूठे रंगों को जीवन के दस दिनों के व्यवहार एवं चहल-पहल में मत भूलो"।।


************ #107 ************


या संसार में आय के, छाड़ि दे तू ऐंठ।लेना होय सो लेइ ले, उठी जात है पैंठ।।

अर्थात

"इस संसार में आकर तुम सब प्रकार के अभिमान को छोड़ दो, जो खरीदना हो खरीद लो, बाजार उठा जाता है"।।


************ #108 ************


कबीर विषधर बहु मिले, मणिधर मिला न कोय।विषधर को मणिधर मिले, विष तजि अमृत होय।।

अर्थात

"गुरु सन्त कबीर जी कहते हैं कि विषधर सर्प अति मिलते है, मणिधर सर्प नहीं मिलता।
यदि विषधर को मणिधर मिल जाये, तो विष मिटकर अमृत हो जाता है"।।


************ #109 ************


खाय पकाय लुटाय के, करि ले अपना काम।चलती बिरिया रे नरा, संग न चले छदाम।।

आर्थत

"पका खा और लुटाकर, अपना कल्याण कर ले। 
हे मनुष्यज़ संसार से कूच करते समय, तेरे साथ एक छदाम भी नहीं जायेगा"।।


************ #110 ************


सह ही में सत बाटई, रोटी में ते टूक।कहै कबीर ता दास को, कबहुँ न आवै चूक।।

अर्थात

"जो सत्तू में से सत्तू और रोटी में से टुकड़ा बाँट देता है, वह भक्त अपने धर्म से कभी नहीं चूकता"।।


************ #111 ************


देह खेह होय जागती, कौन कहेगा देह।निश्चय कर उपकार ही, जीवन का फन येह।।

अर्थात

"मरने के बाद तुमसे कौन देने को कहेगा। 
अतः निश्चयपूर्वक परोपकार करो, येही जीवन का फल है"।।


************ #112 ************


धर्म किये धन ना घटे, नदी ना घट्टै नीर।अपनी आँखों देखिले, यों कथि कहहिं कबीर।।


************ #113 ************


सुख के संगी स्वारथी, दुःख में रहते दूर।कहें कबीर परमारथी, दुःख-सुख सदा हजूर।।

अर्थात

"संसारी स्वार्थी लोग सिर्फ सुख के संगी होते हैं, वे दुःख आने पर दूर हो जाते हैं। 
परन्तु परमार्थी लोग सुख-दुःख सब समय साथ देते हैं"।।


************ #114 ************


झाल उठी झोली जली, खपरा फूटम फूट।योगी था सो रमि गया, आसन रहि भभूत।।

अर्थात

"काल कि आग उठी और शरीर रुपी झोली जल गई, और खोपड़ी हड्डी रुपी खपड़े टूट - फूट गये।
जीव योगी था वह रम गया, आसन, चिता पर केवल राख पड़ी है"।।


************ #115 ************


हरि-रस पीया जाणिये, जे कबहुँ न जाइ खुमार।मैंमंता घूमत रहै, नाहीं तन की सार"।।

अर्थात

"हरि का प्रेम-रस पी लिया, इसकी यही पहचान है कि वह नशा अब उतरने का नहीं, चढ़ा सो चढ़ा। 
अपनापन खोकर मस्ती में ऐसे घूमना कि शरीर का भी मान न रहे।।


************ #116 ************


स्वारथ सुखा लाकड़ा, छाँह बिहूना सूल।पीपल परमारथ भजो, सुखसागर को मूल।।

अर्थात

"स्वार्थ में आसक्ति तो बिना छाया के सूखी लकड़ी है और सदैव संताप देने वाली है। 
और परमार्थ तो पीपल-वृक्ष के समान छायादार सुख का समुन्द्र एवं कल्याण की जड़ है, अतः परमार्थ को अपना कर उसी रस्ते पर चलो"।।


************ #117 ************


परमारथ पाको रतन, कबहुँ न दीजै पीठ।स्वारथ सेमल फूल है, कली अपूठी पीठ।।

अर्थात

"परमार्थ सबसे उत्तम रतन है इसकी ओर कभी भी पीठ मत करो।
और स्वार्थ तो सेमल फूल के समान है जो कड़वा सुगंधहीन है, जिसकी कली कच्ची और उलटी अपनी ओर खिलती है"।।


************ #118 ************


जब लग नाता जाति का, तब लग भक्ति न होय।नाता तोड़े गुरु बजै, भक्त कहावै सोय।।

अर्थात

"जब तक जाति भांति का अभिमान है तब तक कोई भक्ति नहीं कर सकता।
सब अहंकार को त्याग कर गुरु की सेवा करने से गुरु भक्त कहला सकता है"।।


************ #119 ************


माँगन गै सो मर रहै, मरै जु माँगन जाहिं।तिनते पहिले वे मरे, होत करत हैं नाहिं।।

अर्थात

"जो किसी के यहाँ मांगने गया, जानो वह मर गया।
उससे पहले वो मरगया जिसने होते हुए मना कर दिया"।।


Sant Kabir ke Dohe in Hindi


************ #120 ************


माँगन मरण समान है, तेहि दई मैं सीख।कहैं कबीर समझाय को, मति कोई माँगै भीख।।

अर्थात

"माँगन मरने के समान है ये ही गुरु कबीर सीख देते है और समझाते हुए कहते हैं। 
कि मैं तुम्हे शिक्षा देता हूँ, कोई भीख मत मांगो"।।


************ #121 ************


कबीर' भाठी कलाल की, अतिक बैठे आई।सिर सौंपे सोई पिवै, नहीं तौ पिया न जाई।।

अर्थात

"कलाल की भट्ठी पर अति सारे आकर बैठ गये हैं, पर इस मदिरा को एक वही पी सकेगा। 
जो अपना सिर कलाल को खुशी-खुशी सौंप देगा, नहीं तो पीना हो नहीं सकेगा"।।


************ #122 ************


कबीर हरि-रस यौं पिया, बाकी रही न थाकि।पाका कलस कुंभार का, बहुरि न चढ़ई चाकि।।

"हरि का प्रेम-रस ऐसा छककर पी लिया कि कोई और रस पीना बाकी नहीं रहा। 
कुम्हार का बनाया जो घड़ा पक गया, वह दोबारा उसके चाक पर नहीं चढ़ता।
अर्थात मतलब यह कि सिद्ध हो जाने पर साधक पार कर जाता है जन्म और मरण के चक्र को"।।



************ #123 ************


अनमांगा उत्तम कहा, मध्यम माँगि जोलेय।कहैं कबीर निकृष्टि सो, पर घर धरना देय।।

अर्थात

"उपयुक्त बिना माँगे मिला हुआ उत्तम कहा, माँगा लेना मध्यम कहा पराये द्वारे पर धरना दे कर, हठपूर्वक माँगना तो महापाप है"।।


************ #124 ************


अजहूँ तेरा सब मिटे, जो मानै गुरु सीख।जब लग तू घर में रहैं, मति कहुँ माँगे भीख।।

अर्थात

"आज भी तेरे सब दोष दुःख मिट जाये, यदि तू सतगुरु की शिक्षा को सुने और माने। 
जब तक तू ग्रस्थ में है, कहीं भिक्षा मत माँग"।।


************ #125 ************


सुख-दुःख सिर ऊपर सहै, कबहु न छाडै संग।रंग न लागै और का, व्यापै सतगुरु रंग।।

अर्थात

"सभी सुख - दुःख अपने सिर ऊपर सह ले, सतगुरु - सन्तो की संगर कभी न छोड़े।
किसी ओर विषये या कुसंगति में मन न लगने दे, सतगुरु के चरणों में या उनके ज्ञान आचरण के प्रेम में ही दुबे रहें"।।


************ #126 ************

कबीर गुरु कै भावते, दुरहि ते दीसन्त।तन छीना मन अनमना, जग से रूठि फिरंत।।

अर्थात

"गुरु कबीर कहते हैं कि सतगुरु ज्ञान के बिरही के लक्षण दूर ही से दीखते हैं। उनका शरीर कृश एवं मन व्याकुल रहता है, वे जगत में उदास होकर विचरण करते हैं"।।


************ #127 ************


दासातन हरदै बसै, साधुन सो अधिन।कहैं कबीर सो दास है, प्रेम भक्ति लवलीन।।

अर्थात

"जिसके ह्रदे में सेवा एवं प्रेम भाव बसता है और सन्तो कि अधीनता लिये रहता है।
वह प्रेम भक्ति में लवलीन पुरुष ही सच्चा दास है"।।


************ #128 ************


लगा रहै सतज्ञान सो सबही बन्धन तोड़।कहे कबीर वा दास को, काल रहे हथजोड़।।

अर्थात

"जो सभी विषय बंधनों को तोड़कर सदैव सत्य स्वरुप ज्ञान की स्तिति में लगा रहे।
गुरु कबीर कहते हैं कि उस गुरु - भक्त के सामने काल भी हाथ जोड़कर सिर झुकायेगा"।।


************ #129 ************


कामी क्रोधी लालची, इतने भक्ति न होय।भक्ति करे कोई सुरमा, जाति बरन कुल खोय।।

अर्थात

"कामी, क्रोधी और लालची लोगो से भक्ति नहीं हो सकती | जाति, वर्ण और कुल का मद मिटाकर, भक्ति तो कोई शूरवीर करता है"।।


Famous Kabir ke Dohe Hindi 

************ #130 ************


साधु सती और सूरमा, इनका मता अगाध।आशा छाड़े देह की, तिनमें अधिका साध।।

अर्थात

"सन्त, सती और शूर इनका मत अगम्य है।
ये तीनों शरीर की आशा छोड़ देते हैं, इनमें सन्त जन अधिक निश्चय वाले होते होते हैं"।।


************ #131 ************

साधु सती और सूरमा, कबहु न फेरे पीठ।तीनों निकासी बाहुरे, तिनका मुख नहीं दीठ।।

अर्थात

"सन्त, सती और शूर कभी पीठ नहीं दिखाते।
तीनों एक बार निकलकर यदि लौट आयें, तो इनका मुख नहीं देखना चाहिए"।।


************ #132 ************


ये तीनों उलटे बुरे, साधु, सती और सूर।जग में हँसी होयेगी, मुख पर रहै न नूर।।

अर्थात

"साधु, सती और शूरवीर - ये तीनों लौट आये तो बुरे कहलाते हैं। 
जगत में इनकी हँसी होती है, और मुख पर प्रकाश तेज नहीं रहता"।।


************ #133 ************


जीवत समझे जीवत बुझाय, जीवत ही करो आस।जीवत करम की फाँस न काटी, मोये मुक्ति की आस।।


************ #134 ************


माँगन मरन समान है , मत कोई मांगे भीख।माँगन से मरना भला, यह सतगुरु की सीख।।


************ #135 ************


कबीर मन निर्मल, भय जैसे गंगा नीर।पाछे पाछे हर फिरे, कहत कबीर कबीर।।


************ #136 ************


गुरु कुम्हार सिष कुंभ है गढ-गढ काढै खोट।अंतर हाथ सहार दै, बाहर मारै चोट।।


************ #137 ************


कबिरा प्याला प्रेम का, अंतर लिया लगाय।रोम रोम में रमि रहा, और अमल क्या खाय।।


************ #138 ************


लाली मेरे लाल की, जित देखों तित लाल।लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल।।


************ #139 ************


कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूँढै बन माहिं।ऐसे घट में पीव है, संसार जानै नाहिं।।


************ #140 ************


सिर राखे सिर जात है, सिर काटे सिर होय।जैसे बाती दीप की, कटि उजियारा होय।।


************ #141 ************


जिन ढूँढा तिन पाइयाँ, गहिरे पानी पैठ।जो बौरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ।।


************ #142 ************


बिरहिनि ओदी लाकडी, सपचे और धुँधुआय।छूटि पडौं या बिरह से, जो सिगरी जरि जाय।।


************ #143 ************

लिखा-लिखी की है नहीं, देखा देखी बात।दुलहा दुलहिनि मिलि गए, फीकी परी बरात।।रोडा होइ रहु बाटका, तजि आपा अभिमान।लोभ मोह तृस्ना तजै, ताहि मिलै ईश्वर।।

Kabir Das ke Bhajan/Dohe


करम गति टारै नाहिं टरी।। टेक।

मुनि वसिष्ठ से पण्डित ज्ञानी, सिधि के लगन धरि।
सीता हरन मरन, दसरथ को बनमें बिपति परी।।

कहँ वह फन्द कहाँ वह पारधि कहॅं वह मिरग चरी।
कोटि गाय नित पुन्य करत नृग गिरगिट-जोन परि।।

पाण्डव जिनके आप सारथी तिन पर बिपति परी।
कहत कबीर सुनो भै साधो होने होके रही।।


************ #1 ************


बीत गये दिन भजन बिना रे।
भजन बिना रे भजन बिना रे॥

बाल अवस्था खेल गँवायो।
जब यौवन तब मान घना रे॥

लाहे कारण मूल गँवायो।
अजहुं न गयी मन की तृष्णा रे॥

कहत कबीर सुनो भई साधो।
पार उतर गये संत जना रे॥

************ #2 ************


राम बिनु तन को ताप न जाई।
जल में अगन रही अधिकाई।।
राम बिनु तन को ताप न जाई।।

तुम जलनिधि मैं जलकर मीना।
जल में रहहि जलहि बिनु जीना।।
राम बिनु तन को ताप न जाई।।

तुम पिंजरा मैं सुवना तोरा।
दरसन देहु भाग बड़ मोरा।।
राम बिनु तन को ताप न जाई।।

तुम सद्गुरु मैं प्रीतम चेला।
कहै कबीर राम रमूं अकेला।।
राम बिनु तन को ताप न जाई।।


************ #3 ************


मोको कहां ढूँढे रे बन्दे,
मैं तो तेरे पास में।
ना तीरथ मे ना मूरत में,
ना एकान्त निवास में।।
ना मंदिर में ना मस्जिद में,
ना काबे कैलास में।
मैं तो तेरे पास में बन्दे,
मैं तो तेरे पास में।।
ना मैं जप में ना मैं तप में,
ना मैं बरत उपास में।
ना मैं किरिया करम में रहता,
नहिं जोग सन्यास में।।
नहिं प्राण में नहिं पिंड में,
ना ब्रह्याण्ड आकाश में।
ना मैं प्रकुति प्रवार गुफा में,
नहिं स्वांसों की स्वांस में।।
खोजि होए तुरत मिल जाउं,
इक पल की तालास में।
कहत कबीर सुनो भई साधो,
मैं तो हूं विश्वास में।।


************ #4 ************

भजो रे भैया राम गोविंद हरी।
राम गोविंद हरी भजो रे भैया राम गोविंद हरी।।

जप तप साधन नहिं कछु लागत खरचत नहिं गठरी।।
संतत संपत सुख के कारन जासे भूल परी।।
कहत कबीर राम नहीं जा मुख ता मुख धूल भरी।।


************ #5 ************


मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में।
जो सुख पाऊँ राम भजन में।।
सो सुख नाहिं अमीरी में।
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में।।

भला बुरा सब का सुनली जै,
कर गुजरान गरीबी में।
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में॥

आखिर यह तन छार मिलेगा।
कहाँ फिरत मग़रूरी में।।
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में।

प्रेम नगर में रहनी हमारी।
साहिब मिले सबूरी में,
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में॥

कहत कबीर सुनो भयी साधो,
साहिब मिले सबूरी में।
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में॥



************ #6 ************



केहि समुझावौ सब जग अन्धा।। टेक।।

इक दु होयँ उन्हैं समुझावौं,
सबहि भुलाने पेटके धन्धा।
पानी घोड पवन असवरवा,
ढरकि परै जस ओसक बुन्दा।।
गहिरी नदी अगम बहै धरवा,
खेवन-हार के पडिगा फन्दा।
घर की वस्तु नजर नहि आवत,
दियना बारिके ढूँढत अन्धा।।
लागी आगि सबै बन जरिगा,
बिन गुरुज्ञान भटकिगा बन्दा।
कहै कबीर सुनो भाई साधो,
जाय लंगोटी झारि के बन्दा।।



सन्त कबीर दास जी की अन्य रचनाएं


साधो, देखो जग बौराना ।
साँची कही तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना।।
हिन्दू कहत,राम हमारा, मुसलमान रहमाना।
आपस में दौऊ लड़ै मरत हैं, मरम कोई नहिं जाना ।
अति मिले मोहि नेमी, धर्मी, प्रात करे असनाना ।
आतम-छाँड़ि पषानै पूजै, तिनका थोथा ज्ञाना ।
आसन मारि डिंभ धरि बैठे, मन में अति गुमाना ।
पीपर-पाथर पूजन लागे, तीरथ-बरत भुलाना ।
माला पहिरे, टोपी पहिरे छाप-तिलक अनुमाना ।
साखी सब्दै गावत भूले, आतम खबर न जाना ।
घर-घर मंत्र जो देन फिरत हैं, माया के अभिमाना ।
गुरुवा सहित सिष्य सब बूढ़े, अन्तकाल पछिताना ।
अतिक देखे पीर-औलिया, पढ़ै किताब-कुराना ।
करै मुरीद, कबर बतलावैं, उनहूँ खुदा न जाना ।
हिन्दू की दया, मेहर तुरकन की, दोनों घर से भागी ।
वह करै जिबह, वो झटका मारे, आग दोऊ घर लागी ।
या विधि हँसत चलत है, हमको आप कहावै स्याना ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, इनमें कौन दिवाना।।


कबीर के पद


************ #1 ************

अरे दिल,

प्रेम नगर का अंत न पाया, ज्‍यों आया त्‍यों जावैगा।।
सुन मेरे साजन सुन मेरे मीता, या जीवन में क्‍या क्‍या बीता।।
सिर पाहन का बोझा लीता, आगे कौन छुड़ावैगा।।
परली पार मेरा मीता खडि़या, उस मिलने का ध्‍यान न धरिया।।
टूटी नाव, उपर जो बैठा, गाफिल गोता खावैगा।।
दास कबीर कहैं समझाई, अंतकाल तेरा कौन सहाई।।
चला अकेला संग न कोई, किया अपना पावैगा।।


************ #2 ************

रहना नहीं देस बिराना है।
यह संसार कागद की पुड़िया, बूँद पड़े घुल जाना है।
यह संसार काँटे की बाड़ी, उलझ-पुलझ मरि जाना है।
यह संसार झाड़ और झाँखर, आग लगे बरि जाना है।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, सतगुरू नाम ठिकाना है।।

Conclusion :

In this post, we have shared with you the best 150+ Kabir Ke Dohe Hindi | कबीर के दोहे अर्थ सहित. And they are all well explained in hindi. If you also liked this post, then share these Kabir couplets with your friends and make their life better.


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